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Workshop on ‘High Quality Publications in Agriculture’ | ‘कृषि में उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशन’ पर कार्यशाला

Jul 29, 2026 : ICAR-CPCRI, Kasaragod | Author:Web Admin

A workshop on "High Quality Publications in Agriculture", in Hindi, was organised at ICAR-CPCRI, Kasaragod in hybrid mode on 29 July 2026. The programme was presided over by Dr. K.B. Hebbar, Director, ICAR-CPCRI, Kasaragod. Shri Madhusudhanan M., District Information Officer, Kasaragod was the chief guest. The programme also had a technical session on forenoon and afternoon covering six different types of communications relevant for researchers, with two exercises activities for the participants on popular article writing and social media communications. About 100 participants participated in this programme at Kasaragod, along with participants joined online from all the Regional Stations, Research Centres of CPCRI and its KVKs of Kasaragod and Kayamkulam. Dr. M.S. Venkatesh, Principal Scientist, DCR, Puttur was the chief guest for the valedictory session, chaired by Dr. K.B. Hebbar, Director, in the afternoon, Dr. K.B. Hebbar, Director, delivering presidential address, Shri Madhusudhanan M., District Information Officer, addressing the participants, A view of the workshop participants

भा.कृ.अनु.प.– के.रो.फ.अ.सं., कासरगोड में हाइब्रिड मोड में 29 जुलाई 2026 को "कृषि में उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशन" पर हिंदी में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. के.बी. हेब्बार, निदेशक, भा.कृ.अनु.प.– के.रो.फ.अ.सं., कासरगोड ने की। श्री मधुसूदन एम., जिला सूचना अधिकारी, कासरगोड मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम में पूर्वाह्न और अपराह्न में छह विभिन्न प्रकार के संचारों पर एक तकनीकी सत्र भी शामिल था जो शोधकर्ताओं के लिए प्रासंगिक थे, जिसमें प्रतिभागियों के लिए लोकप्रिय लेख लेखन और सोशल मीडिया संचार पर दो अभ्यास गतिविधियां शामिल थीं। कासरगोड में इस कार्यक्रम में लगभग 100 प्रतिभागियों ने भाग लिया, साथ ही सभी क्षेत्रीय स्टेशनों, संस्थान के अनुसंधान केंद्रों और कासरगोड और कायमकुलम के इसके केवीके से ऑनलाइन प्रतिभागियों ने भाग लिया। परिसमापन सत्र डॉ. के.बी. हेब्बार, निदेशक की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ जिस के मुख्य अतिथि डॉ. एम.एस. वेंकटेश, प्रधान वैज्ञानिक, भा.कृ.अनु.प.–डीसीआर, पुत्तूर रहे।

*श्री मधुसूदन एम, जिला सूचना अधिकारी, कासरगोड, मुख्य अतिथि का सन्देश*

आईसीएआर-सीपीसीआरआई (ICAR-CPCRI) के आदरणीय निदेशक, पीएमई (PME) सेल के सदस्यगण, उपस्थित वरिष्ठ वैज्ञानिक, शोधकर्ता और मेरे प्रिय साथियों,

आप सभी को मेरा सप्रेम नमस्कार।

कासरगोड के कृषि परिदृश्य की रीढ़ और देश भर में रोपण फसलों (Plantation Crops) के अनुसंधान में अग्रणी संस्थान, आईसीएआर-सीपीसीआरआई में उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत गौरव का विषय है। जब पीएमई सेल ने मुझे "कृषि में उच्च गुणवत्तायुक्त प्रकाशन" (High-Quality Publication in Agriculture) विषय पर आयोजित इस एक दिवसीय हिंदी कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया, तो मैंने इसे सहर्ष स्वीकार किया।

जनसंपर्क, सूचना तंत्र और सरकारी नीतियों के समन्वय के क्षेत्र में कार्य करने के कारण, मैं दैनिक जीवन में यह स्पष्ट रूप से अनुभव करता हूँ कि जटिल वैज्ञानिक ज्ञान को आम जनमानस तक पहुँचाने में भाषा की क्या भूमिका होती है।

विज्ञान के प्रसार में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भाषाओं का महत्व

हम अक्सर वैज्ञानिक अनुसंधान और भाषा को दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखते हैं—विज्ञान को केवल आंकड़ों और तकनीकों का क्षेत्र माना जाता है, जबकि भाषा को केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने या प्रशासनिक औपचारिकताओं को पूरा करने का साधन।

लेकिन कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में, सम्प्रेषण (Communication) विज्ञान से अलग नहीं है—यह वैज्ञानिक प्रक्रिया का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

सीपीसीआरआई की प्रयोगशालाओं या प्रायोगिक खेतों में किया गया कोई क्रांतिकारी शोध केवल उच्च प्रभाव वाले अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं (High-impact journals) तक सीमित रहकर अपनी पूर्ण सार्थकता प्राप्त नहीं कर सकता। कोई भी शोध तभी वास्तव में सफल है जब वह कागजों से निकलकर खेतों और किसानों तक पहुँचे। यदि अनुसंधान केवल कठिन तकनीकी शब्दावली तक सीमित रह जाता है, तो वह उन लोगों तक नहीं पहुँच पाता जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है—हमारे किसान, कृषि विस्तार अधिकारी और स्थानीय नीति निर्माता।

यहाँ हिंदी भाषा एक महत्वपूर्ण सेतु (Bridge) की भूमिका निभाती है। एक प्रमुख राष्ट्रीय भाषा होने के नाते, हिंदी दक्षिण भारत में विकसित तकनीकों और ज्ञान को उत्तरी, मध्य और पूर्वी भारत के कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान केंद्रों और किसान नेटवर्क से जोड़ती है। हिंदी में उच्च गुणवत्तायुक्त कृषि साहित्य लिखना केवल आधिकारिक अनुपालन (Official Compliance) नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिक ज्ञान का लोकतंत्रीकरण (Democratization of Knowledge) है।

"उच्च गुणवत्तायुक्त प्रकाशन" का वास्तविक अर्थ क्या है?

जब हम किसी आधिकारिक या भारतीय भाषा में "उच्च गुणवत्तायुक्त प्रकाशन" की बात करते हैं, तो अक्सर यह भ्रम होता है कि इसका अर्थ अंग्रेजी के किसी जटिल शोध पत्र का कठिन शब्दों में शब्दशः अनुवाद कर देना है।

 

विज्ञान सम्प्रेषण में वास्तविक गुणवत्ता के तीन मुख्य स्तंभ हैं:

सटीकता के साथ स्पष्टता: हिंदी लेखन अत्यधिक जटिल या कठिन शब्दावली से बोझिल नहीं होना चाहिए। इसमें वैज्ञानिक तथ्यों और आंकड़ों का समावेश सरल, स्पष्ट और व्याकरणिक रूप से सटीक भाषा में होना चाहिए।

व्यावहारिक प्रासंगिकता: जब आप कीट प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य या फसल उपज में सुधार पर हिंदी में लिखते हैं, तो भाषा ऐसी होनी चाहिए जो पाठक की व्यावहारिक आवश्यकताओं के अनुकूल हो।

दोहरे वर्ग तक पहुँच (वैज्ञानिक और आम जन): हिंदी में उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशनों को दो स्तरों पर कार्य करना चाहिए:

वैज्ञानिक समुदाय के लिए: शोध पत्र और तकनीकी बुलेटिन जो गहन समीक्षा (Peer review) के मानकों पर खरे उतरें।

कृषि सूचना तंत्र के लिए: लोकप्रिय लेख और प्रचार सामग्री जो जटिल शोध को किसानों के लिए व्यावहारिक ज्ञान में बदल सके।

जिला सूचना अधिकारी का दृष्टिकोण

जिला सूचना अधिकारी के रूप में मेरा मुख्य दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि शासन और विज्ञान की महत्वपूर्ण जानकारी जनता तक सटीक, त्वरित और सरल रूप में पहुँचे। कासरगोड और पूरे देश के लिए कृषि जीवन की धुरी है। चाहे वह जलवायु परिवर्तन की चुनौती हो या नारियल विकास से जुड़ी तकनीकें, जनता सीपीसीआरआई जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से प्रामाणिक जानकारी की अपेक्षा रखती है।

जब आप वैज्ञानिक हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में उच्च गुणवत्तायुक्त शोध प्रकाशित करते हैं, तो इससे जनसंपर्क विभाग का कार्य अधिक प्रभावी हो जाता है। आपकी प्रामाणिक जानकारी के आधार पर ही हम प्रेस विज्ञप्तियां, जागरूकता अभियान और जन-शिक्षा सामग्री तैयार कर पाते हैं।

निष्कर्ष

मैं आज की कार्यशाला में उपस्थित सभी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं से आग्रह करता हूँ कि वे हिंदी में लेखन को एक अतिरिक्त कार्यभार न समझकर, अपने शोध के दायरे को विस्तारित करने के एक सशक्त माध्यम के रूप में देखें।

मैं पीएमई सेल और आईसीएआर-सीपीसीआरआई के नेतृत्व को इस उपयोगी कार्यशाला के आयोजन के लिए बधाई देता हूँ। मुझे विश्वास है कि आज का यह आयोजन आपके शोध और देश के कृषि समुदाय दोनों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद। जय हिंद।